बुंदेलखंड दो राज्यों- उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला हुआ है। इसमें कुल तेरह  जिले आते हैं। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के सागर जिले से उत्तर प्रदेश के बांदा तक जाएं तो एक नजारा जरुर आपको देखने मिल जाएगा और वह है, गांव के बाहर गौवंश का जमावड़ा। ‘गाय’ को लेकर राजनीति तो खूब होती है, मगर बुंदेलखंड में जहां गाय बहुत जादा संकट में है उसकी किसी को परवाह नहीं है। आलम यह है कि किसानों द्वारा छोड़ी गई गायों को स्थानीय व्यक्ति की मदद से ही निर्जन स्थान तक ले जाया जाता है, जहां से इस कारोबार में लगे लोग ट्रक आदि में भरकर गायों को ले जाते हैं।

किसी समय गाय को गौमाता माना जाता था लेकन आज इस माता की स्थिति  बहुत ही दयनीय है।
आज गाय बहुत ही बेबस असहाय है। आज जो गाय पालक है  वह गाय को नही रखना चाहते। इसका एक अहम कारण यही होता है कि अधिकांश गायेँ कम दूध देती हैं क्योंकि यहाँ का देसी गौवंश अच्छे बछड़े देने मे सक्षम है जो खेती के लिए उपयुक्त होते हैं पर खेती तो आज ट्रैक्टर से होती है और गाय के अमृत तुल्य दूध के कीमत मात्र 25 रुपए लिटर किसानों को मिलती है। ऐसे में जैसे ही वे दूध देना बंद करती हैं उसके मालिक को उसकी खानगी में आने वाला खर्च भी ज्यादा लगने लगता है। गौवंश की कीमत यहां इतनी कम है कि उसे छुटटा छोड़ देने में भी उसे कोई नुकसान होता नहीं दिखता है। अलबत्ता उसे गायों और बछड़ों के चारे और भूसे पर होने वाले खर्च से निजात मिल जाती है। इसी में वह खुश हो जाता है। क्षेत्र में एक की देखादेखी दूसरे भी उसी सूत्र को अपनाते हैं।

इस प्रकार बुंदेलखंड की स्थिति इतनी भयावह हो गयी है कि वहां गाय और किसान एक दूसरे के विरोधी हो गए है और गायें आवारा पशुओं की तरह रोड पर ही जीने और मरने को मजबूर हैं। किसानों ने फसल बचाने के लिए खेत के चारों ओर कंटीले तार बांध दिये हैं जो इतने नुकीले हैं कि जैसे ही कोई गौवंश भूख से व्याकुल होकर खेत मे जाने का प्रयास करते हैं उनका शरीर के अंग जैसे गला, पेट, पैर जो भी नुकीले तार के संपर्क में आते हैं कट फट जाते हैं और गौवंश घाव मे कीड़े पड़ जाने से तड़प कर मरते हैं। हर रोज सैकड़ों गौवंश इस प्रकार मर रहे हैं। बहुत से गौवंश भूख और प्यास से दम तोड़ रहे हैं। न लोग न सरकार कोई कुछ नहीं कर रहा सब तमाश बीन बन कर इस दुर्लभ जीव की मृत्यु का तमाशा देख रहे हैं।

आज का बड़ा सवाल यह है कि आखिर गौवंश जाए तो कहां जाएं उन्हें अपना पेट भरने के लिए न तो
खाना मिलाता है और स्थान न मिलने के कारण सड़कों पर विचरण करने से आये दिन हो रही दुर्घटनाओं से वे लगातर मर रहे हैं । अगर यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपने बच्चों को डायनासोर जैसे चित्र में गाय आदि को दिखाएंगे। यह बड़ा ही ￵चिंतनीय विषय है पर न साशन न जनता कोई भी इस विषय पर कोई ठोस कार्य नहीं कर रहे।

धिक्कार है हमारी मरी हुयी भावनाओं पर, हमारी संकीर्णता पर जो भौतिकता की चका चौंध मे इतनी व्यस्त है कि परम कल्याणकारी गौवंश की समाप्ति मे सहयोगी की भूमिका निभा रही है। इस पाप का कोई प्रायश्चित नहीं है। यह अभिशाप बनकर हम सबके जीवन मे आने वाला है। अगर आगामी पीढ़ी को सुरक्षित रखना है तो आगे बढ़कर अपनी स्वार्थपरता को त्यागते हुये गौवंश रक्षा हेतु सभी सहयोग करें अन्यथा अपनी बर्बरता का बर्बर परिणाम हमें ही भोगना पड़ेगा।