महात्मा रामचन्द्र वीर (जन्म १९०९ – मृत्यु २००९) वीर जी ऐसे परम तेजस्वी संत थे जिनकी दहाड़ से, ओजस्वी वाणी से, पैनी लेखनी की धार के प्रहार से राष्ट्रद्रोही, धर्मद्रोही कांप उठते थे। वे ऐसे प्राणिवत्सल संत थे जिनका ह्रदय धर्म व मजहब के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की हत्या देखकर द्रवित हो उठता था। उन्होंने जगह-जगह पहुंचकर कुछ मंदिरों में अंधविश्वास व गलत रूढ़ियों के कारण की जाने वाली पशु बलि के विरुद्ध न केवल प्रवचनों के माध्यम से जनजागरण किया, अपितु अनशन व प्रचार करके लगभग ग्यारह सौ देवालयों में पशु बलि की राक्षसी व धर्मविरोधी कुप्रथा को बन्द करवाने में सफलता प्राप्त की। इस महान गोभक्त विभूति के अनशनों के कारण देश के कई राज्यों में गोहत्याबन्दी कानून बनाये गये।

गोभक्ति की प्रेरणा
वीर जी को गोभक्ति अपने पिता से विरासत में मिली थी। वीर जी ने जब देखा देश के विभिन राज्यों में कसाईखाने बनाकर गोवंश को नष्ट किया जा रहा है तो इन्होंने गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगने तक आजीवन अन्न और नमक न ग्रहण करने कीजो कठिन प्रतिज्ञा की जिसे इन्होंने अंतिम साँस तक निभाया.

काठियावाड़ के नवाबी राज्य मांगरोल के शासक मुहम्मद जहाँगीर ने राज्य में गोवंश हत्या को प्रोत्साहन दिया था। वीर जी को स्थानीय गोभक्तो से जब यह पता चला तो वे सन १९३५ में मांगरोल जा पहुंचे और गोहत्या पर प्रतिबन्ध की मांग को लेकरअनशन शुरू कर दिया, परिणामस्वरुप शासन को झुकना पड़ा और गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

गोरक्षा अभियान में विश्वविख्यात अनशन
गोरक्षा आन्दोलन के दौरान गोहत्या तथा गोभक्तों के नरसंहार के विरुद्ध पुरी के शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी व वीर जी ने अनशन किये. तब वीर जी ने भी पूरे १६६ दिन का अनशन करके संसार भर में गोरक्षा की मांगपहुँचाने में सफलता प्राप्त की थी।

सतत संघर्ष
वीर जी महाराज ने देश की स्वाधीनता, मूक प्राणियों व गोमाता की रक्षा व हिन्दू हितों के लिए २८ बार जेल यातनाएं सहन कीं |

वीर जी स्वामी श्रद्धानन्द, पंडित मदनमोहन मालवीय, वीर सावरकर, भाई परमानन्द जी, केशव बलिराम हेडगवार जी के प्रति श्रद्धा भाव रखते थे। संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवालकर उपाख्य श्री गुरुजी,भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार, लाला हरदेव सहाय, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री जैसे लोग वीर जी के त्यागमय, तपस्यामय, गाय और हिन्दुओं की रक्षा के लिए किये गए संघर्ष के कारण उनके प्रति आदर भाव रखते थे।

महाप्रयाण
वीर जी गोरक्षा के लिए संघर्ष करते हुए २४ अप्रैल २००९ ई० को शतायु पूर्ण करते हुए विराटनगर (राजस्थान) में स्वर्ग सिधार गए|